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स्वर्ण जयंती संगोष्ठी श्रंखला की अंतिम संगोष्ठी

1857 की उत्तर-सदी स्वर्ण जयंती संगोष्ठी श्रंखला की अंतिम संगोष्ठी

केंद्रीय हिंदी संस्थान 1857 की उत्तरसदी स्वर्ण जयंती के अवसर पर कोलकाता मुंबई और हैदराबाद में राष्ट्रीय संगोष्ठियों के सफल आयोजन के बाद इस कड़ी की चौथी और अंतिम संगोष्ठी दिनांक 8-10 मई 2007 को एन.सी.पी.यू.एल के सह-संयोजकत्व में साहित्य अकादेमी सभागार, नई दिल्ली में करने जा रहा है। इस संगोष्ठी का उद्घाटन करेंगे माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री क्षी अर्जुन सिंह। विषय प्रवर्तन करेंगे वरिष्ठ आलोचक एवं संस्थान के निदेशक प्रो.शंभुनाथ।

गौरतलब है कि इन राष्ट्रीय संगोष्ठियों के माध्यम से देश भर के हिंदी विद्वान, हिंदीतर भारतीय भाषाओं के विद्वानों और लेखकों के साथ पहली बार व्यापक सांस्कृतिक संवाद कर रहे हैं। नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय है '1857, नव जागरण एवं उत्तर भारतीय भाषाएँ।' संगोष्ठी में भारतीय भाषाओं के समक्ष 21वीं सदी की चुनौती पर भी चर्चा होगी।

संस्थान के निदेशक प्रो.शंभुनाथ संगोष्ठी की चर्चा के बिंदुओं का खुलासा करते हुए कहा कि इस संगोष्ठी के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि में सभी उत्तर भारतीय भाषाओं की स्वातंत्र्य-मुखरता और सामाजिक संचेतना से जुड़े अस्मिता बोध के विविध फलक उभर कर सामने आएंगे। किस तरह 1857 का असर उत्तर भारत की भाषाओं और बोलियों की नई पहचान और नये तेवर तय करता है? - यह अपने-आप में महत्वपूर्ण तथ्य है, जिसे इस संगोष्ठी के माध्यम से स्पष्ट तौर पर रेखांकित किया जा सकेगा।

संगोष्ठी में हिंदी-उर्दू के अलावा कश्मीरी, डोगरी, पंजाबी और सिंधी भाषाओं के विद्वान भी भाग लेंगे। इस दृष्टि से यह राष्ट्रीय संगोष्ठी इन भाषाओं के बीच सांस्कृतिक सेतु निर्माण का कार्य भी करेगी।