बुधवार, नव 20

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जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग की राष्ट्रीय संगोष्ठी

 ‘इंटरनेट और आज का मास मीडिया’

(दिनांक 16-17 मार्च, 2016)

केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के तत्वावधान में ‘इंटरनेट और आज का मास मीडिया’ विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी एवं पर्यावरण पर चित्र-प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कुलदीप अग्निहोत्री ने मीडिया में निहित स्वार्थों की बढ़ती घुसपैठ पर चिंता जाहिर की। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार श्री राहुल देव ने सोशल मीडिया को मीडिया के समावेशीकरण एवं लोकतंत्रीकरण के रूप में देखने के साथ-साथ तकनीक के दुरुपयोग के बारे में भी आगाह किया। द्वितीय सत्र में डॉ. देवेंद्र शुक्ल एवं वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल एवं राजशंकर शर्मा ने भी पर्यावरण के संदर्भ में जनसंचार माध्यमों की भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र में संस्थान के प्रशिक्षु पत्रकारों ने भी प्रतिभाग किया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में संस्थान के निदेशक प्रो. नंद किशोर पाण्डेय ने तकनीक माध्यमों को हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ने पर जोर दिया। कार्यक्रम में प्रो. सुन्दर लाल, प्रो. गिरजा शंकर शर्मा, डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ, प्रो. हरिशंकर, प्रो. वीना शर्मा, प्रो. देवेन्द्र शुक्ल, कुलसचिव डॉ. चंद्रकांत त्रिपाठी सहित संस्थान के विभिन्न प्राध्यापक ओर छात्र-छात्राएं सम्मलित थे, कार्यक्रम के संयोजक एवं विभागाध्यक्ष श्री केशरी नंदन ने सभी को धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम का संचालन श्री अनुपम श्रीवास्तव द्वारा किया गया।


लाइक....कमेंट...शेयर...सोशल... मीडिया एक बड़ा मायाजाल बन गया है, और नई पीढ़ी इसकी गिरफ्त में है,- यह उद्गार वरिष्ठ पत्रकार एन.आर.स्मिथ ने केंद्रीय हिंदी संस्थान में मीडिया विषयक सेमीनार में व्यक्त किए।
सोशल मीडिया विशेषज्ञ राकेश उपाध्याय ने डिजिटल व्यस्तता के चलते समाज से कटाव पर चिंता जाहिर कि सोशल मीडिया आम आदमी के लिए हथियार बन गया है व इंटरनेट आम आदमी की ताकत बन गया है। उन्होंने बताया कि आम आदमी सोशल मीडिया का उपयोग कर सोशल जर्नलिस्ट की भूमिका निभा रहा है। एन.आर.स्मिथ के अतिरिक्त ‘आई.बी.एन. खबर’ के वरिष्ठ पत्रकार दीपक पालीवाल ने इस बात को दोहराया कि अखबारों के समाचारों की गुणवक्ता एवं विश्वसनीयता इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं साइबर मीडिया से कहीं अधिक बनी हुई है, भले ही यह दौर ब्रेंकिंग न्यूज का माना जा रहा हो। भरत मल्होत्रा ने साइबर मीडिया एवं सोशल मीडिया के तकनीकी पक्षों पर प्रकाश डालते हुए क्षेत्रीय भाषाओं एवं हिंदी पत्रकारिता में उपलब्ध अवसरों के बारे में बताया। ब्लॉगर प्रतीक पांडेय ने भारत में ब्लॉगिंग के विकास और युवाओं में इसकी लोकप्रियता के बारे में अपने अनुभव साइना किए। उन्होंने मध्यपूर्व की जैस्मिन क्रांति में सोशल मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डाला। न्यूज पोर्टल समाचार4मीडिया के सहायक संपादक अभिषेक मल्होत्रा ने कहा कि सोशल मीडिया आजकल ‘ट्रेंड सेटर’ की भूमिका में आ गया है।
वरिष्ठ पत्रकार ऋषि माथुर ने प्रशिक्षण की कमी पर चिंता जाहिर करते हुए समाचारों को पाठकों के जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि संवाददाता आजकल घटना स्थल पर कम पहुँच पा रहे हैं और सोशल मीडिया समाचारों के स्रोत के रूप में भी कार्य कर रहा है। पीयूष पांडेय ने कहा कि सोशल मीडिया ने लोगों को एक मंच प्रदान किया है लेकिन जवाबदेही तय न होने के कारण इसके अपने खतरे हैं इस कारण अफवाहें फैलती हैं और हाल में हुए साम्प्रदायिक दंगे इस के प्रमाण है।
अंतिम सत्र में डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ एवं ऋषि माथुर ने संस्थान के प्रशिक्षु पत्रकारों की जिज्ञासाओं का समाधान ने करते हुए उन्हें पत्रकारिता के गुर बताये। संचालन वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल ने किया। संस्थान के वरिष्ठ आचार्य प्रो. देवेंद्र शुक्ल तथा डॉ. राजशंकर शर्मा ने प्रशिक्षुओं का मार्गदर्शन एवं उत्साहवर्द्धन किया।
विभागाध्यक्ष तथा संगोष्ठी के संयोजक श्री केशरी नंदन ने दो दिसवीय संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा श्री अनुपम श्रीवास्तव ने कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु धन्यवाद ज्ञापन किया।


अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग की राष्ट्रीय संगोष्ठी 2016

“हिंदी भाषा शिक्षण : विदेशी विद्यार्थियों के संदर्भ में”
(दिनांकः 18-19 मार्च 2016)

केंद्रीय हिंदी संस्थान के अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षण विभाग द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन संस्थान के नज़ीर सभागार में हुआ।

उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में जी.एल.ए. विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दुर्ग सिंह चौहान उपस्थित थे। इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होनें बताया कि मनुष्य में सीखने की असीम सम्भावनायें होती है और हमारे इमोशन भाषा सीखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विकता की भावना हमारे मन मे होनी चाहिये, हम अपने रीति-रिवाजों से जुड़े रहें तभी हम अपनी भाषाओं का भी विकास कर पायेंगे।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. रमेश चन्द्र शर्मा तथा विदेश स्थित भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के कार्यक्रम निदेशक श्री संजय वेदी तथा ओस्लो,नार्वे में हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘स्पाईल दर्पण’ के संपादक श्री सुरेश चन्द्र शुक्ल उपस्थित थे।

संगोष्ठी के परिप्रेश्य में अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. रमेश चन्द्र शर्मा ने इस संगोष्ठी की महत्ता पर विचार व्यक्त करते हुए भाषा शिक्षण की प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला।

श्री संजय वेदी ने विदेशों में हिंदी शिक्षण और प्रचार-प्रसार संबंधी विभिन्न प्रशासनिक एवं शैक्षिणिक अपेक्षाओं और स्थितियों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि विदेशों में हिंदी शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए टीचिंग मैटेरियल नवीन टैक्नोलॉजी पर आधारित हो तभी छात्रों में एक नई भाषा सीखने की रूचि पैदा होगी। उन्होनें ऑनलाईन हिंदी टीचिंग और अनुवाद जैसे विषयों के लिए विशेष पाठ्यक्रम आयोजित करने का सुझाव सामने रखा।

श्री सुरेश चन्द्र शुक्ल ने समृद्ध हिंदी साहित्य के जरिये हिंदी को लोकप्रिय बनाने की बात की। इस संदर्भ में उन्होंने पाठ्यक्रम से इतर विविध साहित्य को भी सिखाने की बात की।
संगोष्ठी के अध्यक्ष एवं संस्थान के निदेशक प्रो. नंद किशोर पाण्डेय जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में संस्थान द्वारा विदेशी विद्यार्थियों को दिये जाने वाले हिंदी शिक्षण की समृद्ध परम्परा से परिचित कराते हुए इस बात पर जोर दिया कि हम आधुनिक समय और परिवेश के अनुसार हिंदी शिक्षण को नये रूप में ढालें। उन्होनें कहा कि यह संस्थान की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वह हिंदी भाषा शिक्षण के लिए मानक एवं श्रेष्ठ पाठ्यक्रम और शिक्षण तकनीकी विकसित करे।

विभागाध्यक्ष डॉ. गंगाधर वानोडे ने संगोष्ठी में पधारे गणमान्य अतिथियों और विद्वज्जनों का स्वागत कर संगोष्ठी का परिचय सभा के समक्ष रखा। कार्यक्रम का संचालन तथा धन्यवाद ज्ञापन श्रीमती शालिनी श्रीवास्तव ने किया।

इस अवसर पर संस्थान के विभिन्न विभागों को शैक्षिक सदस्यों एवं विद्यार्थियों के साथ-साथ देश के कई विश्वविद्यालयों से आये प्रोफेसर, संस्थान के पूर्व प्रोफेसरगण उपस्थित थे जिनमें प्रो. अश्वनी श्रीवास्तव, प्रो. चतुर्भुज सहाय, प्रो. वशिनी शर्मा, प्रो. मीरा सरीन, प्रो. भरत सिंह, डॉ. अपर्णा सारस्वत, डॉ. रेखा द्विवेदी, डॉ. आरती दुबे, डॉ. आनंद राय, प्रो. हरिशंकर, प्रो. देवेन्द्र शुक्ल, प्रो. वीना शर्मा, डॉ. ज्योत्स्ना रघुवंशी, डॉ. राजवीर सिंह, डॉ. सपना गुप्ता, डॉ. जोगेन्द्र सिंह मीणा, डॉ. के.जी. कपूर, डॉ. रामलाल वर्मा, श्रीमती प्रीति गुप्ता, श्रीमती रश्मि सिंह, श्री केशरी नंदन, श्री अनुपम श्रीवास्तव, श्री ऋषि माथुर एवं कुलसचिव डॉ. चंद्रकांत त्रिपाठी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

अखिल भारतीय कविता कार्यशाला का आयोजन

"कविता में अर्थ होता नहीं है, कवि द्वारा दिया जाता है। जिस तरह एक पुरानी लोक कथा में राक्षस के प्राण तोते में बसते थे, उसी तरह कविता का अर्थ ढँढ़ना भी दुरूह पहेली है।" ये विचार हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष और महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति डा. नामवर सिंह, ने 1-2 सितम्बर, 06 को उदयपुर में आयोजित अखिल भारतीय कविता कार्यशाला के उद्घाटन व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। कार्यशाला का आयोजन मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, उ.प्र. हिंदी संस्थान, लखनऊ, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा तथा शब्दम् शिकोहाबाद के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया था।

समारोह के विशिष्ट अतिथि उ.प्र. हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष श्री सोम ठाकुर ने कहा कि नए युग की नई संवेदनशीलता कविता के लिए नय़ा मुहावरा गढ़ती है। इस अवसर पर केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के कुलसचिव डा. चंद्रकान्त त्रिपाठी ने कहा कि संस्थान का प्रयास है कि कविताओं की संगीतात्मक प्रस्तुतियों को बढ़ावा दिया जा सके।

कार्यशाला के प्रथम सत्र के मुख्य अतिथि विख्यात हिंदी कवि केदारनाथ सिंह तथा विशिष्ट अतिथि कवि वीरेन डंगबाल थे। इस सत्र में विनय सौरभ (झारखण्ड), शिव कुमार (जयपुर), राजीव सभरबाल (भोपाल), शशि मिश्रा (आगरा), माया त्रिपाठी (आगरा), पवन करण (ग्वालियर) आदि ने कविता पाठ किया।

कार्यशाला के दूसरे दिन प्रथम सत्र में गोपाल सहर (गुजरात), सुभाष सिगाठिया (श्रीगंगा नगर), अम्बिका दत्त (कोटा), आशुतोष कुमार (अलीगढ़) तथा द्वितीय सत्र में आशीष त्रिपाठी (बाराणसी), प्रभात (जयपुर), गिरिराज किराडू (जोधपुर) आदि ने कविताओं का पाठ किया।

दो दिन तक चले इस आयोजन के समापन समारोह में प्रो. केदारनाथ सिंह ने समापन व्याख्यान देते हुए कहा कि कार्यशाला मूलतः समाज विज्ञान से आया हुआ शब्द है। लेकिन कविता में कार्यशाला के आयाम बदल जाते हैं। सामूहिक साहचर्य से कविगण कविता-कौशल और काव्य-संवेदन के संबंधों को गहराई से समझ पाते हैं।

कार्यशाला के अंत में सभागार के समीप उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा लगाई गई पुस्तक प्रदर्शनी का विद्यार्थियों तथा पाठक समुदाय ने लाभ प्राप्त किया।

लघु पत्रिकाओं पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

"लघु पत्रिकाएँ विकल्पों की संवाहक हैं। लघु पत्रिकाओं को सामाजिक-आर्थिक विषमताओं का वैज्ञानिक ढंग से सामना करना होगा।" यह बात केंद्रीय हिंदी संस्थान, द्वारा आगरा में लघु पत्रिकाओं पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के अध्यक्षीय वक्तव्य में संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो.रामशरण जोशी ने कही। यह आयोजन संस्थान के नजीर सभागार में संपन्न हुआ। संगोष्ठी में दिल्ली, पंजाब, उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल के पचास से अधिक संपादक-लेखकों ने सहभागिता की। इनमें हिंदी के अलावा पंजाबी लेखक भी शामिल हुए। संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए 'पहल' के संपादक ज्ञानरंजन ने कहा कि टेलीविजन और बड़े सूचना घरानों के बावजूद लघु पत्रिकाएँ अपनी विशिष्टता के कारण जानी जाती हैं।

केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक और उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष प्रो.शंभुनाथ ने कहा, लघु पत्रिका लिटिल मीडिया है। यह संस्कृति उद्योगों द्वारा लगातार हाशिए पर ढकेली जा रही कलाओं, संस्कृतियों और विचारधाराओं की जु़बान है।

संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का फोकस 'भाषाई साम्राज्यवाद की चुनौतियाँ और लघु पत्रिकाएँ' विषय पर था। कथाकार रमेश उपाध्याय ने अपना आलेख पढ़ते हुए कहा कि यह साम्राज्यवाद का ही असर है कि चारों तरफ अँग्रेजी राज कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषाई साम्राज्यवाद का विरोध अंग्रेजी का विरोध नहीं है।
साहित्यिक पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विभूतिनारायण राय का कहना था कि भूमंडलीकरण और बाजारवाद से निराश होने और इन पर विलाप करने से कुछ नहीं होगा। विषम स्थितियों में ही श्रेष्ठ साहित्य रचा जाता है। हेतु भारद्वाज ने कहा कि लघु पत्रिकाएँ बड़े लक्ष्य लेकर काम करती हैं। गोपाल राय ने लघु पत्रिकाओं के लिए एक वेबसाइट की जरूरत बताई। इस सत्र के अध्यक्ष कवि राजेश जोशी का कहना था कि उपभोक्तावाद विचार-शून्यता फैला रहा है। लघु पत्रिकाएँ एक जुट होकर इस चुनौती का जवाब दे सकती हैं। इस सत्र में भारत भारद्वाज, गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव, अजेय कुमार, रवि शंकर रवि, योगेन्द्र कुमार, ज्योत्स्ना रघुवंशी, वीना शर्मा ने चर्चा में हिस्सा लिया।

समापन सत्र में अजय तिवारी ने अपना वक्तव्य रखते हुए कहा कि लघु पत्रिकाएँ वृहद मीडिया के विकल्प के रूप में एक आन्दोलन है। प्रफुल्ल कोलख्यान का कहना था कि लघु पत्रिका आन्दोलन में प्रतिद्वंद्विता की नहीं सहकारिता की जरूरत है। शिवराम ने कहा कि आज विमर्श निष्कर्ष प्रदान नहीं करते। हमारे भीतर एन.जी.ओ.-वाद घुस गया है। सत्रोपरांत प्रश्न-चर्चा में रामकुमार कृषक, जयप्रकाश धूमकेतु, राजेन्द्र शर्मा, इन्दु सिंह, प्रो.रामवीर सिंह, दिवाकर भट्ट, रमेश रावत आदि के अलावा केंद्रीय हिंदी संस्थान के देशी-विदेशी विद्यार्थियों ने उत्साह से भाग लिया।

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन महेश जायसवाल द्वारा एक जनगीत के गायन और कुलसचिव चंद्रकांत त्रिपाठी के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।

भारतीय प्रकाशन की समस्याओं पर विकास संगोष्ठी

केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली केन्द्र द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के लेक्चर हाल में 'भारतीय प्रकाशन की समस्याएँ' विषय पर 9 अगस्त 06 को एक दिवसीय विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी दो सत्रों में आयोजित की गई। प्रथम सत्र का आधार-विषय था : 'हिंदी प्रकाशन उद्योगः समस्याएँ और संस्कृति'। द्वितीय सत्र में 'पुस्तकें: पाठकों की खोज में', विषय पर चर्चा हुई। इस संगोष्ठी में वरिष्ठ लेखकों, प्रकाशकों और पाठकों ने सक्रिय भूमिका निभाई।

उद्घाटन सत्र की विषय-प्रस्तुति संस्थान के निदेशक प्रो.शंभुनाथ ने की। संगोष्ठी की मूल संकल्पना को रेखांकित करते हुए प्रो.शंभुनाथ ने कहा कि जब तक लेखकों, पाठकों और प्रकाशकों का समन्वित त्रिभुज नहीं निर्मित होता और उनमें आपसी संवाद नहीं बढ़ता, तब तक देश में पुस्तक-चेतना की क्रान्ति नहीं आ सकती।

संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो.रामशरण जोशी ने संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए कहा कि पुस्तकों ने समाज में लोकतांत्रिक संस्कारों को जगाया है। राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान, कोलकाता के निदेशक श्री के. के. बनर्जी ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि आज पूरी दुनिया ग्लोबल विलेज बन रही है और हम इंटरनेट के दरवाजे पर खड़े हैं। अब तो डिजिटल बुक्स का ज़माना आ गया है। ऐसे परिवेश में पुस्तक-प्रकाशन को उद्योग का दर्जा देने और राष्ट्रीय पुस्तक नीति बनाने की बेहद जरूरत है।

उद्घाटन सत्र में प्रतिष्ठत प्रकाशन नेशनल पब्लिशिंग हाउस के वयोवृद्ध संस्थापक श्री कन्हैयालाल मलिक को संस्थान के उपाध्यक्ष श्री रामशरण जोशी ने सम्मानित किया।

संगोष्ठी के प्रथम सत्र (भारतीय प्रकाशन की समस्याएँ) की अध्यक्षता प्रो. शंभुनाथ ने की। वरिष्ठ प्रकाशक श्री अरुण माहेश्वरी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत में प्रकाशन उद्योग के लिए परिस्थितियाँ पाश्चात्य जगत की भाँति सुविधाजनक और अनुकूल नहीं हैं फिर भी हमें निराश नहीं होना चाहिए।

संगोष्ठी के द्वितीय एवं समापन सत्र (पुस्तकें- पाठकों की खोज में) की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार एवं विचारक प्रो. इन्द्रनाथ चौधरी ने की। संगोष्ठी का संचालन संस्थान के प्रकाशन-प्रबंधक ङॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा ने किया।